वाम के जंग की फसल

वाम के जंग की फसल काटी कांग्रेस ने, वाम का अंत हो गया, वाम का अंत हो गया।

 सोवियत रूस खत्म हो गया तो फिर वाम का साथ क्यों दें। ऐसे आम सवालों पर चिंतक और राजनीतिज्ञ बहुत संतुलित और बौद्धिक जवाब देते रहे हैं। लेकिन पिछले दिनों प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने हंसी-हंसी में जो बात कही वह बस हंसी में उड़ाने वाली नहीं थी। प्रभात पटनायक ने एक समारोह में अपनी बात रखते हुए कहा कि बिहार अद्भुत जगह है और वहां से अद्भुत बयान भी आ जाते हैं। बिहार में किसी ने वाम नेता से पूछा कि जब सोवियत रूस खत्म हो गया तो वाम की बात क्यों करते हो। नेता ने कहा कि अरे अगर ताजमहल तोड़ दिया जाएगा तो क्या प्यार की बात कहना छोड़ दोगे।

ताजमहल रहे या न रहे प्यार एक वैश्विक मूल्य है वह रहेगा। हां, ताजमहल मोहब्बत की एक निशानी है। सोवियत संघ भी साम्यवादी क्रांति का प्रतीक था, सर्वहारा की क्रांति का प्रतीक था, मजदूरों की सरकार का प्रतीक था। सोवियत रूस ढहा दिया गया, आज वह नहीं है। लेकिन प्यार की तरह ही साम्यवाद भी एक वैश्विक मूल्य है। पूंजीपतियों के बार-बार कुचले जाने के बाद भी यह उठ कर खड़ा हो ही जाता है। साम्यवाद से अच्छी विचारधारा दुनिया में और कौन हो सकती है जो कहती है कि उत्पादन के साधनों पर सबका बराबर का अधिकार हो।

इन दिनों मार्क्स की दो सौवीं जयंती मनाने की तैयारी चल रही है। यह वह समय भी है जब वैश्विक स्तर पर मार्क्सवाद को खारिज भी किया जा रहा है और पूंजीवाद से चरमराए देशों में मार्क्सवाद नई ताकत के साथ खड़ा भी हो रहा है। उदारवाद के प्रतीक रहे फ्रांस में आज जो पीली जैकेट मध्यवर्गीय क्रांति का नया झंडा बना है उसके मूल में मजदूरों को शोषण-मुक्ति की राह दिखाने वाला वह लाल झंडा भी है।

कार्ल मार्क्स की दौ सौवीं जयंती और मार्क्स को खारिज किए जाने वाले इस समय में किसी ने पूछा कि सोवियत क्रांति के बाद क्या हुआ। जवाब था कि कुछ नहीं, इंसान पहली बार चांद पर पहुंचा। कामगारों के लिए काम करने के लिए आठ घंटे का वक्त तय किया गया और उनकी सामाजिक सुरक्षा की बात हुई। रूस में अक्टूबर क्रांति के एक महीने बाद ही 27 नवंबर 1917 को दुनिया में पहली मैटरनिटी लीव दी गई थी।

आज भारतीय संदर्भ में तीन हिंदी प्रदेशों के नतीजों की बात करेंगे तो भी यह समझ जाएगा कि सोवियत रूस ढह चुका है लेकिन उसका मलबा दुनिया के हर कोने में अपनी विचारधारा की छोटी-मोटी इमारत खड़ी कर ही देता है। यूपीए के भ्रष्टाचार से तंग आकर देश की जनता ने नरेंद्र मोदी और भाजपा को चुना क्योंकि कांग्रेस के बाद मुख्य मुकाबले में वही थे। पूंजीवादी ताकतों ने एक ऐसा नरेटिव तैयार किया कि किसान, मजदूर, रोजी-रोटी के सभी सवालों को परे धकेल धार्मिक उन्माद फैलाया गया। साथ ही यह डर भी फैलाया गया कि इसका विकल्प कोई नहीं है। कहा गया कि नरेंद्र मोदी का विकल्प कोई नहीं है। इसी समय बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का बयान शायद अपने समय का सबसे साहसिक और सटीक बयान था। उन्होंने कहा था कि 2019 का चुनाव मोदी और जनता के बीच होगा।

लेकिन मोदी और चुनाव के बीच जनता को लाएगा कौन। इसका जवाब लालू यादव नहीं वाम शक्ति के पास था। जब कांग्रेस भी गाय, गंगा, गोबर, मंदिर-मस्जिद और गोत्र व जनेऊ में फंस गई थी तो आॅल इंडिया किसान समिति देश के किसानों को मोदी के सामने खड़ा कर रही थी। बाजार से बेदखल किसानों को वाम झंडे के नीचे शक्ति मिली और उन्होंने आत्महत्या के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। मध्यप्रदेश में जब किसानों ने शिवराज सरकार से अपना हक मांगा तो उन्हें गोलियां मिलीं। राजस्थान में किसान से लेकर खेत मजदूर संगठित हुए और अपना हक मांगा। महाराष्टÑ में किसानों, आदिवासियों, भूमिहीनों और खेतिहर मजदूरों के ऐतिहासिक मुंबई कूच ने भारत ही नहीं पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा और अहंकारी मोदी सरकार के प्रतिनिधि देवेंद्र फड़णवीस को किसानों से संवाद करने के लिए मजबूर होना पड़ा और सरकार के साथ बराबरी का हाथ मिलाकर किसान अपने खेतों की ओर लौटे। 

भूमि अधिग्रहण कानून के बाद मोदी सरकार में वाम शक्तियों ने किसानी के संकट को चुनाव का नरेटिव बनाया। स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पर जवाब मांगा जाने लगा और युवा पूछने लगे कि मेरी बेरोजगारी और मेरे किसान पिता की आत्महत्या में क्या संबंध है। इसी नरेटिव का असर था कि हजार किलो प्याज बेच कर जब हजार रुपए की रकम मिली तो किसान ने सरेआम एलान कर उस रकम को प्रधानमंत्री राहत कोष में दान दे दिया। दिल्ली के रामलीला मैदान से किसान कह गए थे कि हम सरकार की र्इंट से र्इंट बजा देंगे तो वह साहस कहां से आया। वाम शक्तियों ने चुनावी मैदान में खेती-किसानी के संघर्ष के जो बीज बोए थे उसकी फसल आज कांग्रेस ने काट तो ली है लेकिन देखना यह है कि वह सूट-बूट वाली सरकार और चोर ही चौकीदार वाले नारों पर कितना टिक पाती है। भाजपा आज उसी नवउदारवादी सड़क को हाइवे बना रही है जिसकी बुनियाद कांग्रेस ने रखी थी। लेकिन फ्रांस से लेकर भारत के तीन राज्यों ने जिस रोजी-रोटी और कामगारों को फिर से नरेटिव में रखा है वह नरेटिव आता ही रहेगा क्योंकि वामपंथ जिंदा है।

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